Dhyan Sadhana

ध्यान में सांस अपने आप रुकने लगे तो क्या करें?

ध्यान करते समय कई साधकों को एक ऐसा अनुभव होता है, जिसके बारे में वे खुलकर बात नहीं कर पाते. अचानक ध्यान की अवस्था में यह अहसास होने लगता है कि सांस अपने आप रुक गई है. न भीतर जा रही है, न बाहर आ रही है. शरीर जैसे स्थिर हो गया हो. कुछ लोगों को यह अनुभव बहुत गहरा और सुखद लगता है, तो कुछ लोगों के लिए यह डर और घबराहट का कारण बन जाता है. मन में सवाल उठता है कि कहीं यह कोई खतरे की बात तो नहीं, या फिर यह ध्यान में आगे बढ़ने का कोई संकेत है.

असल में यह अनुभव जितना रहस्यमय दिखता है, उससे कहीं ज्यादा स्वाभाविक और प्राकृतिक भी हो सकता है. जरूरत है इसे सही संदर्भ में समझने की, न तो इससे डरने की और न ही इसे कोई उपलब्धि मान लेने की.

ध्यान में सांस अपने आप रुकना क्या होता है ?

सबसे पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि ज्यादातर मामलों में सांस सच में पूरी तरह रुकती नहीं है. ध्यान की गहराई बढ़ने पर सांस इतनी धीमी, हल्की और सूक्ष्म हो जाती है कि उसका एहसास ही नहीं होता. बाहर से देखने पर लगेगा कि शरीर सांस नहीं ले रहा, लेकिन भीतर जीवन की प्रक्रिया चल रही होती है. यह वही अवस्था है जैसे गहरी नींद में सांस बहुत शांत हो जाती है, पर रुकती नहीं.

यह स्थिति किसी प्रयास से नहीं आती. साधक ने न तो सांस रोकने की कोशिश की होती है, न कोई जोर लगाया होता है. यह पूरी तरह सहज रूप से घटने वाला अनुभव होता है.

"जब मन पूरी तरह शांत हो जाता है, तब सांस भी दिखाई देना बंद कर देती है."

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ध्यान के दौरान सांस अपने आप क्यों रुकने लगती है ?

सांस और मन का रिश्ता बहुत गहरा है. जब मन अशांत होता है, तो सांस तेज चलती है. जब मन डर में होता है, तो सांस उथली हो जाती है. उसी तरह जब मन गहरे ध्यान में उतरता है, तो सांस अपने आप शांत हो जाती है. उस समय शरीर को ज्यादा ऊर्जा की जरूरत नहीं रहती, इसलिए सांस को तेज रखने का कोई कारण नहीं बचता.

ध्यान के दौरान सांस अपने आप क्यों रुकने लगती है

यह शरीर की अपनी बुद्धि है. वह जानता है कि कब कितना चाहिए. इसीलिए ध्यान में सांस का सूक्ष्म होना कोई असामान्य घटना नहीं है.

"जो शरीर अपने आप करता है, वही सुरक्षित होता है."

क्या ध्यान में सांस रुकना अच्छा संकेत है ?

अगर यह अनुभव बिना किसी डर के हो रहा है, अगर मन में घबराहट नहीं है, अगर शरीर हल्का लग रहा है और ध्यान की धारा टूट नहीं रही, तो इसे ध्यान की गहराई का एक संकेत माना जा सकता है. लेकिन यहां एक बात साफ समझनी चाहिए. यह संकेत है, मंजिल नहीं.

कई साधक इस अनुभव को पकड़ने की कोशिश करने लगते हैं. वे हर ध्यान में वही अवस्था दोहराना चाहते हैं. यहीं से समस्या शुरू होती है.

"सही अनुभव वह नहीं जो दोहराया जाए, सही अनुभव वह है जो छोड़ना सिखा दे."

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ध्यान में सांस अपने आप रुकने लगे तो क्या करें ?

सबसे पहली और सबसे जरूरी बात है घबराना नहीं. डर आते ही मन सक्रिय हो जाता है और ध्यान टूट जाता है. अगर आपको महसूस हो कि सांस नहीं चल रही है, तो उसे जबरदस्ती चलाने की कोशिश न करें. शरीर को ढीला छोड़ दें और देखें कि भीतर क्या हो रहा है.

अगर शरीर खुद से सांस लेने की मांग करे, तो धीरे और सहज तरीके से सांस ले लें. इसमें कोई गलती नहीं है. ध्यान कोई परीक्षा नहीं है कि हर हाल में किसी अवस्था को बनाए रखना ही पड़े.

ध्यान को सिर्फ नाक की सांस तक सीमित न रखें. पूरे शरीर में फैलने दें. यह अनुभव को संतुलित रखता है.

"साक्षी बने रहना ही इस अवस्था का सबसे सुरक्षित रास्ता है."

क्या सांस को जानबूझकर रोकना सही है ?

इस सवाल का जवाब बहुत साफ है. नहीं. ध्यान सांस को देखने की प्रक्रिया है, उसे नियंत्रित करने की नहीं. खासकर शुरुआती साधकों के लिए जानबूझकर सांस रोकना नुकसानदायक हो सकता है. इससे सिर भारी होना, घबराहट, बेचैनी और मानसिक असंतुलन बढ़ सकता है.

 ध्यान सांस को देखने की प्रक्रिया है

कई बार लोग इंटरनेट पर पढ़ी अधूरी जानकारी के आधार पर सांस रोकने के प्रयोग करने लगते हैं, जो आगे चलकर परेशानी का कारण बनता है.

"जो अपने आप होता है, वही योग है. जो हम करवाते हैं, वहीं जोखिम शुरू होता है."

कब यह अनुभव सावधानी का संकेत देता है ?

अगर सांस रुकने के साथ-साथ छाती में दबाव महसूस हो, दिल की धड़कन तेज हो जाए, डर बढ़ने लगे या ध्यान के बाद शरीर कमजोर और चिड़चिड़ा महसूस करे, तो यह संकेत है कि साधना की तीव्रता अभी ज्यादा हो गई है. ऐसी स्थिति में ध्यान का समय कम करना चाहिए या विधि को सरल बनाना चाहिए.

ध्यान हमेशा शरीर और मन के अनुकूल होना चाहिए. जबरदस्ती किया गया ध्यान नुकसान पहुंचा सकता है.

ध्यान में सांस रुकना और कुंडलिनी अनुभव.

अक्सर लोग सांस रुकने के अनुभव को सीधे कुंडलिनी जागरण से जोड़ देते हैं. यह जरूरी नहीं है. सांस का सूक्ष्म होना ध्यान की गहराई का संकेत हो सकता है, लेकिन कुंडलिनी से जुड़े अनुभव इससे कहीं ज्यादा व्यापक होते हैं. वे शरीर, ऊर्जा और चेतना तीनों स्तरों पर दिखाई देते हैं.

"हर गहरी शांति कुंडलिनी नहीं होती, लेकिन हर कुंडलिनी अनुभव गहराई जरूर लाता है."

ध्यान के बाद क्या करना चाहिए ?

ध्यान पूरा होने के बाद तुरंत उठ जाना या मोबाइल देखने लगना ठीक नहीं. कुछ मिनट सामान्य सांस लेते हुए शांत बैठें. इससे शरीर को नई अवस्था से बाहर आने का समय मिलता है.

थोड़ा पानी पीना और हल्का चलना शरीर को संतुलन में लाता है. ये छोटी बातें ध्यान के अनुभवों को सुरक्षित और स्थिर बनाती हैं.

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ध्यान में होने वाली सबसे बड़ी गलती.

सबसे बड़ी गलती है अनुभवों को उपलब्धि मान लेना. सांस रुकना, शरीर हल्का लगना या गहरी शांति आना, ये सब रास्ते के दृश्य हैं, मंजिल नहीं. जो साधक इन अनुभवों को पकड़ने लगते हैं, वे अक्सर आगे अटक जाते हैं.

"ध्यान अनुभव इकट्ठा करने का नहीं, बल्कि खाली होने का रास्ता है."

अंतिम बात.

ध्यान में सांस अपने आप रुकना न तो कोई सिद्धि है और न ही कोई बीमारी. यह बस इस बात का संकेत हो सकता है कि कुछ क्षणों के लिए मन शांत हुआ.

अगर ध्यान के बाद जीवन में संतुलन बढ़ रहा है, व्यवहार सरल हो रहा है और भीतर स्थिरता आ रही है, तो रास्ता सही है. बाकी सब अनुभव आते जाते रहेंगे.


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