क्रिया योग के जरिए कुंडलिनी जागरण | क्रिया योग क्या है ?

जब लोग कुंडलिनी जागरण की बात करते हैं, तो ज़्यादातर ध्यान तुरंत तेज़ अनुभवों पर चला जाता है. किसी को झटके लग रहे हैं, किसी को प्रकाश दिख रहा है, किसी को शरीर में गर्मी महसूस हो रही है. ऐसे अनुभव सुनकर मन में या तो आकर्षण पैदा होता है या डर.
लेकिन सच यह है कि कुंडलिनी जागरण का सबसे स्थिर और सुरक्षित मार्ग अक्सर सबसे शांत होता है. क्रिया योग उसी शांत मार्ग का नाम है.
क्रिया योग में न तो कोई दिखावा है, न बाहरी चमत्कार. इसमें न तो शरीर को जबरदस्ती मोड़ा जाता है और न ही मन पर दबाव डाला जाता है. यह अभ्यास अंदर की व्यवस्था को धीरे-धीरे संतुलित करता है, ताकि कुंडलिनी ऊर्जा खुद ऊपर उठने के लिए तैयार हो जाए.
क्रिया योग वास्तव में क्या है
क्रिया योग को समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि यह कोई एक एक्सरसाइज़ नहीं है. यह कोई तुरंत परिणाम देने वाली तकनीक भी नहीं है.
क्रिया योग एक प्रक्रिया है.
एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें सांस, चेतना और रीढ़ की धुरी एक साथ काम करती हैं.
पतंजलि योगसूत्र में क्रिया योग को तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान के रूप में बताया गया है. लेकिन बाद में बाबाजी, लाहिड़ी महाशय और योगानंद की परंपरा में इसे एक व्यावहारिक रूप मिला. यही वह रूप है जिसमें क्रिया योग कुंडलिनी जागरण से जुड़ता है.
यह योग पद्धति सीधे सुषुम्ना नाड़ी पर काम करती है. वही नाड़ी जिसे कुंडलिनी ऊर्जा का मुख्य मार्ग माना जाता है.
कुंडलिनी और सुषुम्ना का संबंध
कुंडलिनी को सामान्य भाषा में जीवन ऊर्जा कहा जाता है. यह ऊर्जा शरीर में हर जगह फैली होती है, लेकिन उसका केंद्र बिंदु मूलाधार के क्षेत्र में माना गया है.
सुषुम्ना नाड़ी एक सूक्ष्म मार्ग है जो रीढ़ की हड्डी के भीतर मानी जाती है. जब यह नाड़ी सक्रिय नहीं होती, तब कुंडलिनी ऊर्जा नीचे ही सीमित रहती है. जीवन चलता रहता है, लेकिन चेतना का विस्तार नहीं होता.
क्रिया योग का काम इस नाड़ी को धीरे-धीरे जाग्रत करना है. कोई झटका नहीं, कोई जल्दबाज़ी नहीं. बस धीरे-धीरे श्वास और ध्यान के जरिए रास्ता साफ किया जाता है.
क्रिया योग में कुंडलिनी कैसे जागती है
यहाँ सबसे ज़रूरी बात समझनी होगी.
क्रिया योग में कुंडलिनी को जबरदस्ती नहीं उठाया जाता.
ज्यादातर पारंपरिक ग्रंथ यही चेतावनी देते हैं कि कुंडलिनी को खींचना खतरनाक हो सकता है. क्रिया योग उस रास्ते से बचता है. इसमें शरीर और मन को इतना संतुलित किया जाता है कि ऊर्जा खुद ऊपर जाने लगे.
इस प्रक्रिया में मुख्य भूमिका सांस की होती है.
क्रिया योग की श्वास बहुत गहरी और बहुत धीमी होती है. साधक सांस को रीढ़ के साथ महसूस करना सीखता है. जैसे सांस नीचे से ऊपर उठ रही हो और फिर ऊपर से नीचे लौट रही हो.
धीरे-धीरे जब यह अभ्यास स्थिर होता है, तो कुछ साधकों को रीढ़ में हल्की गर्मी, दबाव या कंपन महसूस हो सकता है. ये संकेत होते हैं कि सुषुम्ना सक्रिय हो रही है.
यह अनुभव हर व्यक्ति में अलग होता है. किसी के लिए बहुत सूक्ष्म, किसी के लिए थोड़ा स्पष्ट.
क्रिया योग का अभ्यास क्रम
क्रिया योग अचानक शुरू नहीं होता. इसमें भी एक तैयारी की प्रक्रिया होती है.
शुरुआत आमतौर पर सांस की जागरूकता से होती है. साधक पहले यह सीखता है कि कैसे बिना प्रयास के सांस को देखना है. यहीं से मन की चंचलता कम होने लगती है.
इसके बाद सांस और रीढ़ का संबंध जोड़ा जाता है. ध्यान को धीरे-धीरे शरीर के अंदर ले जाया जाता है. इस दौरान आँखें बंद रहती हैं और शरीर लगभग स्थिर.
कुछ समय बाद, जब यह अभ्यास गहरा हो जाता है, तो ध्यान स्वतः रीढ़ के भीतर टिकने लगता है. यहाँ से कुंडलिनी प्रक्रिया शुरू मानी जाती है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि क्रिया योग में चक्रों पर फोकस करने का ज़ोर नहीं होता. न ही रंग या प्रकाश की कल्पना कराई जाती है. सब कुछ प्राकृतिक ढंग से होने दिया जाता है.
क्रिया योग और अचानक अनुभवों का अंतर
बहुत लोग पूछते हैं कि क्रिया योग करने से कोई बड़ा अनुभव क्यों नहीं होता.
असल में क्रिया योग का उद्देश्य अनुभव पैदा करना नहीं है. इसका उद्देश्य चेतना को स्थिर करना है. जब चेतना स्थिर होती है, तब कुंडलिनी सुरक्षित रूप से आगे बढ़ती है.
जिन पद्धतियों में अचानक अनुभव आते हैं, वहाँ शरीर और मन अक्सर तैयार नहीं होते. इसीलिए बाद में समस्याएँ भी आती हैं जैसे नींद खराब होना, डर, बेचैनी, सिर भारी लगना.
क्रिया योग इस खतरे को काफी हद तक कम कर देता है.
क्रिया योग के दौरान आने वाले संकेत
क्रिया योग करने वाले साधकों के अनुभव अक्सर बहुत सामान्य से लगते हैं, लेकिन वही असली प्रगति के संकेत होते हैं.
जैसे ध्यान के बाद मन शांत रहना.
बिना कारण अंदर स्थिरता महसूस होना.
भावनाओं में संतुलन आना.
अत्यधिक सोच अपने आप कम होना.
कुछ साधकों को रीढ़ में हल्की गर्मी, सिर के भीतर दबाव या शांति का गहरा भाव भी आता है. लेकिन इन पर ध्यान देने से ज्यादा ज़रूरी होता है अभ्यास जारी रखना.
संदर्भ और परंपरा का आधार
क्रिया योग की पूरी परंपरा अनुभव आधारित है. योगानंद की Autobiography of a Yogi में कई साधकों के वास्तविक अनुभव मिलते हैं. लाहिड़ी महाशय के पत्रों में यह साफ लिखा है कि क्रिया योग का लक्ष्य शरीर को माध्यम बनाना है, बाधा नहीं.
पतंजलि योगसूत्र में भी यह संकेत मिलता है कि योग का अंतिम उद्देश्य चित्त की वृत्तियों का निरोध है. कुंडलिनी जागरण उसी का एक स्वाभाविक परिणाम माना जा सकता है, लक्ष्य नहीं.
क्या हर कोई क्रिया योग से कुंडलिनी जगा सकता है
यह सवाल ईमानदारी से समझना ज़रूरी है.
हर कोई क्रिया योग कर सकता है.
लेकिन हर किसी में कुंडलिनी एक ही गति से नहीं जागती.
यह व्यक्ति की जीवनशैली, मानसिक स्थिति, अनुशासन और निरंतरता पर निर्भर करता है. कुछ लोग वर्षों तक अभ्यास करते हैं और उनके अनुभव बहुत शांत रहते हैं. कुछ को बीच में ऊर्जा के स्पष्ट संकेत मिलने लगते हैं.
दोनों ही स्थितियाँ सही हैं.
क्रिया योग में सबसे बड़ी सावधानी
सबसे बड़ी गलती जो लोग करते हैं, वह है तुलना.
किसी का अनुभव सुनकर अपने अनुभव को कम समझना.
क्रिया योग में तुलना प्रगति को रोक देती है. यहाँ हर साधक का मार्ग अलग होता है. कुंडलिनी जागरण कोई प्रतियोगिता नहीं है.
दूसरी सावधानी है जल्दबाज़ी. अधिक देर बैठना, सांस को रोकने की कोशिश करना, या बिना मार्गदर्शन के उन्नत तकनीक अपनाना नुकसानदायक हो सकता है.
अंतिम बात
क्रिया योग के जरिए कुंडलिनी जागरण कोई चमत्कार नहीं है. यह जीवन को धीरे-धीरे भीतर से व्यवस्थित करने की प्रक्रिया है.
जो लोग शांति से अभ्यास करते हैं, अनुशासन रखते हैं और परिणामों के पीछे नहीं भागते, उनके लिए क्रिया योग एक बहुत सुरक्षित दरवाज़ा खोलता है.
कुंडलिनी ऊर्जा जब तैयार होती है, तो उसे उठने के लिए किसी आदेश की ज़रूरत नहीं होती.
वह खुद रास्ता ढूंढ लेती है.
अगर आप चाहें, अगला लेख मैं लिख सकता हूँ
• क्रिया योग और सामान्य ध्यान में अंतर
• क्रिया योग करते समय आने वाली समस्याएँ
• कुंडलिनी जागरण के गलत संकेत और सही संकेत
बस बताइए किस दिशा में आगे बढ़ें 🌿
धन्यवाद !



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