कुंडलिनी जागरण के लिए 5 प्रभावी प्राणायाम !

अंधी मेहनत नहीं, समझ के साथ साधना
कुंडलिनी जागरण को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि यह कोई अचानक होने वाली रहस्यमयी घटना है. लोग सोचते हैं बस किसी एक दिन कुछ जोरदार किया और कुंडलिनी उठ गई. असल में ऐसा नहीं होता.
कुंडलिनी एक शक्ति नहीं, एक प्रक्रिया है. और इस प्रक्रिया की नींव प्राण पर टिकी होती है. जब तक प्राण का प्रवाह ठीक नहीं होता, तब तक कुंडलिनी का सुरक्षित और स्थिर जागरण संभव नहीं होता.
यही कारण है कि योग परंपरा में प्राणायाम को कुंडलिनी साधना का प्रवेश द्वार कहा गया है.
इस लेख में हम ऐसे 5 प्राणायाम समझेंगे जो वास्तव में कुंडलिनी जागरण की तैयारी करते हैं. यहाँ कोई दिखावटी दावा नहीं है. सिर्फ वही बातें हैं जो शास्त्र, अनुभव और व्यावहारिक योग तीनों से मेल खाती हैं.
कुंडलिनी जागरण और प्राणायाम का वास्तविक संबंध
कुंडलिनी मूलाधार में सुप्त रहती है. वहाँ तक ऊर्जा तभी पहुँचती है जब नाड़ियों में अवरोध कम हो. नाड़ियाँ तब शुद्ध होती हैं जब श्वास सही ढंग से बहने लगती है.
प्राणायाम का सीधा काम है
प्राण को जागृत करना
नाड़ियों को खोलना
शरीर और मन के बीच संतुलन बनाना
बिना प्राणायाम के की गई कुंडलिनी साधना अक्सर मानसिक भ्रम, शरीर में असहजता और अधूरे अनुभव छोड़ देती है. इसलिए प्राणायाम कोई विकल्प नहीं, आधार है.
1. नाड़ी शोधन प्राणायाम
कुंडलिनी साधना की पहली सीढ़ी
अगर किसी को सिर्फ एक ही प्राणायाम करना हो, तो वह नाड़ी शोधन होना चाहिए.
यह प्राणायाम इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीनों नाड़ियों को संतुलित करता है. जब इड़ा और पिंगला शांत होती हैं, तभी सुषुम्ना सक्रिय होने लगती है. और कुंडलिनी सुषुम्ना में ही ऊपर की ओर चलती है.

कैसे करें
सीधी रीढ़ के साथ बैठें
दाहिने हाथ से नासिका मुद्रा बनाएं
बाएँ नथुने से श्वास लें
दाहिना नथुना बंद कर बाएँ से श्वास छोड़ें
फिर दाहिने से लें और बाएँ से छोड़ें
श्वास लंबी, गहरी और बिना जोर की हो.
कुंडलिनी पर प्रभाव
मन स्थिर होने लगता है
अनावश्यक विचार कम होते हैं
ध्यान गहरा होने लगता है
ऊर्जा का संतुलन बनता है
कई साधकों को इस प्राणायाम के बाद रीढ़ के बीच हल्की गर्मी या प्रवाह का अनुभव होता है. यह कुंडलिनी जागरण का संकेत नहीं, बल्कि तैयारी का संकेत है. इसे गलत न समझें.
2. कपालभाति प्राणायाम
नीचे जमी ऊर्जा को जगाने वाला अभ्यास
कपालभाति को लेकर बहुत ज़्यादा गलत प्रयोग होते हैं. लोग इसे जल्दी परिणाम पाने के चक्कर में जरूरत से ज्यादा करते हैं, जो नुकसानदायक हो सकता है.
सही तरीके और सीमित मात्रा में की गई कपालभाति मूलाधार और मणिपूर चक्र को सक्रिय करती है. यही वह क्षेत्र है जहाँ कुंडलिनी शक्ति की नींव मजबूत होती है.

कैसे करें
श्वास बाहर फेंकने पर ध्यान रखें
श्वास अंदर अपने आप आने दें
पेट को हल्के झटके से अंदर खींचें
तेज़ी नहीं, लय ज़रूरी है
शुरुआत में 20 से 30 श्वास पर्याप्त हैं.
कुंडलिनी पर प्रभाव
आलस्य कम होता है
नीचे की जड़ता टूटती है
पाचन और ऊर्जा स्तर सुधरता है
शरीर में स्थिर गर्मी महसूस हो सकती है
अगर कपालभाति के बाद बेचैनी, सिर भारी होना या नींद उड़ना शुरू हो जाए, तो समझिए मात्रा गलत है. कुंडलिनी साधना में शरीर की प्रतिक्रिया सबसे बड़ा संकेत होती है.
3. भस्त्रिका प्राणायाम
शक्ति को ऊपर की ओर ले जाने वाला अभ्यास
भस्त्रिका को अग्नि की तरह माना गया है. यह प्राण को तेज़ करता है. लेकिन यह आग अगर काबू में न हो, तो परेशानी भी बन सकती है.
इसलिए भस्त्रिका सिर्फ वही साधक करें जिनका नाड़ी शोधन नियमित है.

कैसे करें
तेज़ लेकिन नियंत्रित श्वास लें और छोड़ें
छाती और पेट दोनों सक्रिय रहें
10 से 15 श्वास के बाद रुकें
फिर सामान्य श्वास लें
एक या दो चक्र ही पर्याप्त हैं.
कुंडलिनी पर प्रभाव
रीढ़ में गर्मी बढ़ती है
ऊर्जा ऊपर की ओर बहने लगती है
ध्यान में कंपन या स्पंदन महसूस हो सकता है
कई लोगों को भस्त्रिका के बाद आँखों के बीच दबाव या हल्का प्रकाश सा लगता है. यह भी तैयारी का लक्षण है, अंतिम लक्ष्य नहीं.
4. उज्जायी प्राणायाम
कुंडलिनी को स्थिरता देने वाला अभ्यास
बहुत से लोग सोचते हैं कि कुंडलिनी सिर्फ तीव्र अभ्यास से जागती है. पर सच यह है कि उसे संभालने के लिए शीतलता और अनुशासन चाहिए.
उज्जायी प्राणायाम प्राण को गहराई देता है और तंत्रिका तंत्र को संतुलित करता है.
कैसे करें
गले को हल्का संकुचित करें
श्वास लेते और छोड़ते समय हल्की ध्वनि महसूस हो
श्वास लंबी और धीमी रखें
यह प्राणायाम ध्यान के साथ सबसे अच्छा काम करता है.
कुंडलिनी पर प्रभाव
अत्यधिक ऊर्जा को संतुलित करता है
डर और अस्थिरता कम करता है
हृदय और कंठ चक्र को सुरक्षित रूप से खोलता है
जिन साधकों को प्राणायाम के बाद भावनात्मक उतार-चढ़ाव आते हैं, उनके लिए उज्जायी बेहद उपयोगी है.
5. ब्रह्मरी प्राणायाम
अंतर की शक्ति को जागृत करने की कुंजी
ब्रह्मरी को अक्सर हल्का अभ्यास समझ लिया जाता है. जबकि यह सूक्ष्म स्तर पर गहरा काम करता है.
यह प्राणायाम अनाहत नाद और आंतरिक कंपन से जुड़ा हुआ है. और कुंडलिनी जागरण का रास्ता अंदर की ध्वनि से होकर गुजरता है.

कैसे करें
श्वास लें
मुँह बंद कर भंवरे जैसी ध्वनि निकालें
ध्यान सिर के अंदर रखें
ध्वनि को शरीर में फैलने दें
5 से 7 बार पर्याप्त हैं.
कुंडलिनी पर प्रभाव
मन पूर्ण शांत होने लगता है
अंतर नाद स्पष्ट होता है
आंतरिक चेतना सक्रिय होती है
कई साधकों को ब्रह्मरी के बाद ध्यान में अपने आप गहराई महसूस होती है. यही इसका असली लाभ है.
प्राणायाम करते समय ज़रूरी सावधानियाँ
कुंडलिनी साधना में सबसे बड़ा नुकसान गलत जानकारी से होता है.
हमेशा खाली पेट अभ्यास करें
रोज़ थोड़ा करें, ज्यादा नहीं
किसी अनुभव के पीछे न भागें
डर या लालच दोनों से दूर रहें
कुंडलिनी जागरण कोई उपलब्धि नहीं, एक ज़िम्मेदारी है.
अनुभव और शास्त्र क्या कहते हैं
हठ योग प्रदीपिका, घेरंड संहिता और शिव संहिता तीनों में साफ कहा गया है कि बिना नाड़ी शुद्धि के कुंडलिनी जागरण अस्थिर रहता है.
आधुनिक योग शिक्षकों का अनुभव भी यही कहता है कि अधिकतर समस्याएँ प्राणायाम की जल्दबाज़ी से आती हैं, साधना से नहीं.
ये पाँच प्राणायाम कुंडलिनी को उठाने के औज़ार नहीं हैं. ये कुंडलिनी के लिए शरीर और मन को योग्य बनाने की प्रक्रिया हैं.
अगर आप सही दिशा में धैर्य से चलते हैं, तो कुंडलिनी अपने समय पर जागती है. उसे खींचना नहीं पड़ता.
शांति, स्थिरता और सादगी ही कुंडलिनी साधना की असली पहचान है.



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