कुंडलिनी जागरण में पंचकोष की भूमिका: अन्नमय से आनंदमय कोष तक सरल और वास्तविक समझ

कुंडलिनी जागरण में पंचकोष की भूमिका: अन्नमय से आनंदमय कोष तक सरल और वास्तविक समझ
कुंडलिनी जागरण को सिर्फ ऊर्जा उठने की घटना मान लेने से पूरी बात सामने नहीं आती. भीतर जो बदलाव होता है, वह परतों में होता है. धीरे धीरे. इन्हीं परतों को उपनिषदों ने पंचकोष कहा है.
अक्सर लोग साधना के दौरान पूछते हैं. शरीर अजीब क्यों लगने लगा है, मन पहले जैसा क्यों नहीं रहा, भावनाएं इतनी तेज क्यों हो गईं, और कभी कभी सब कुछ खाली सा क्यों लगता है. अगर केवल चक्रों की भाषा में जवाब दें तो बात अधूरी रह जाती है. पंचकोष की समझ इन अनुभवों को सही जगह पर रखती है.
इस लेख में हम अन्नमय से आनंदमय कोष तक, हर स्तर को कुंडलिनी जागरण के संदर्भ में देखेंगे. यह कोई किताबी व्याख्या नहीं है. बल्कि वही बात जो लंबे समय तक साधना में रहने पर अपने आप समझ में आने लगती है.
पंचकोष का विचार कहां से आया
तैत्तिरीय उपनिषद में मनुष्य को पांच स्तरों में देखा गया है. इन्हें पंचकोष कहा गया. कोष का अर्थ होता है आवरण. लेकिन इसे ढक्कन समझना गलती होगी. ये आवरण नहीं, बल्कि अनुभव के क्षेत्र हैं.
एक ही व्यक्ति एक समय पर शरीर भी है, श्वास भी है, विचार भी है, समझ भी है, और कभी कभी गहरी शांति भी.
यही पांच स्तर हैं.
अन्नमय. शरीर. प्राणमय. ऊर्जा. मनोमय. विचार और भावना. विज्ञानमय. विवेक. आनंदमय. शांत पूर्णता की झलक.
कुंडलिनी जागरण में चेतना का दबाव बढ़ता है. यही दबाव इन कोषों को भीतर से सक्रिय करता है.
अन्नमय कोष: जहां साधना सबसे पहले दिखती है
अन्नमय कोष हमारा स्थूल शरीर है. जो दिखता है, छुआ जा सकता है, जिसे थकान और आराम दोनों महसूस होते हैं.
जब कुंडलिनी प्रक्रिया शुरू होती है, तो सबसे पहले शरीर प्रतिक्रिया देता है. क्योंकि शरीर सबसे धीमी परत है.
इस स्तर पर जो अनुभव आमतौर पर देखे जाते हैं.
ध्यान में शरीर का अपने आप हिलना. रीढ़ या गर्दन में खिंचाव. कभी अचानक गर्मी, कभी ठंड. नींद का पैटर्न बदल जाना. खाने पीने की पसंद बदल जाना.
यहां एक जरूरी बात समझनी चाहिए. यह शरीर खराब होने का संकेत नहीं होता. यह शरीर का ढलना होता है.
कई साधक इस अवस्था में डर जाते हैं. डॉक्टर बदलते हैं, रिपोर्ट्स करवाते हैं, फिर भी कुछ खास नहीं निकलता. वजह यह है कि समस्या शरीर की नहीं, शरीर की आदतों की होती है.
उपनिषद का वाक्य है. "अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते"
अर्थ साफ है. शरीर अन्न से बना है. जब भीतर चेतना तेज होती है, तो शरीर को भी अपने ढांचे में बदलाव करना पड़ता है.
इस समय साधक के लिए जरूरी होता है.
भारी अभ्यास न करना. खुद को जबरदस्ती न खींचना. नींद और भोजन को नजरअंदाज न करना.
प्राणमय कोष: जहां ऊर्जा सच में महसूस होती है
प्राणमय कोष वह स्तर है जहां लोग सबसे ज्यादा अटकते हैं. क्योंकि यहीं ऊर्जा चलती हुई महसूस होती है.
श्वास, नाड़ियां, अंदर का प्रवाह, सब कुछ यहीं आता है.
इस चरण में साधक कहता है.
रीढ़ में कुछ चल रहा है. सांस अपने आप बदल रही है. सीने में दबाव या फैलाव है. सिर में कंपन है.
यह सब प्राणमय कोष के अनुभव हैं.
एक आम गलती यहां होती है. लोग इस ऊर्जा को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं. सांस रोकते हैं, जबरदस्ती ऊपर ले जाने की कल्पना करते हैं.
असल साधना यहां नियंत्रण नहीं, अनुमति है.
हठयोग प्रदीपिका का वाक्य है. "प्राणेन शून्यं सर्वं जगत्"
प्राण के बिना सब निर्जीव है. जब प्राण सक्रिय होता है, जीवन तेज महसूस होने लगता है.
अगर इस चरण में संतुलन नहीं रखा गया, तो आगे का सफर कठिन हो सकता है.
मनोमय कोष: जहां सबसे ज्यादा उलझन होती है
मनोमय कोष विचार, भावना और स्मृति का क्षेत्र है. कुंडलिनी जागरण में यही सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा होता है.
लोग अक्सर कहते हैं.
मैं पहले शांत था, अब मन ज्यादा हिल रहा है. बिना वजह रोना आ जाता है. पुरानी बातें याद आने लगी हैं.
यह बिगड़ना नहीं है. यह भीतर की सफाई है.
कुंडलिनी मनोमय कोष में दबे हुए संस्कारों को ऊपर लाती है. जो सालों से दबा था, वही बाहर आता है.
यहां साधक अक्सर दो गलती करता है.
या तो वह खुद को दोष देने लगता है. या फिर इन अनुभवों को आध्यात्मिक उपलब्धि मान लेता है.
दोनों ही स्थिति सही नहीं हैं.
योग वशिष्ठ में कहा गया है. "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः"
मन ही बंधन है और मन ही मुक्ति.
इस स्तर पर सबसे जरूरी अभ्यास है. देखना. प्रतिक्रिया न करना.
विज्ञानमय कोष: जब समझ जन्म लेने लगती है
जब मन थोड़ा स्थिर होने लगता है, तब विज्ञानमय कोष सक्रिय होता है.
यहां कोई चमत्कार नहीं दिखता. लेकिन दृष्टि साफ हो जाती है.
व्यक्ति अपने व्यवहार को देखने लगता है. जो जरूरी नहीं है, उससे दूरी बनने लगती है. दिखावे से मन हटने लगता है.
यह कोष साधक को जमीन पर टिकाए रखता है. यही कारण है कि बिना विवेक के जागरण खतरनाक कहा गया है.
यहां साधक को लगता है कि वह कुछ खो रहा है. लेकिन असल में वह भ्रम छोड़ रहा होता है.
आनंदमय कोष: जिसे पकड़ा नहीं जा सकता
आनंदमय कोष कोई स्थायी अवस्था नहीं है. यह कभी कभी खुलता है. और फिर बंद हो जाता है.
कभी गहरी शांति. कभी ऐसा लगता है कि कुछ भी कमी नहीं है.
यह सुख नहीं है. यह उत्तेजना नहीं है. यह बहुत शांत अनुभव है.
यही कारण है कि उपनिषद चेतावनी देते हैं. "आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्"
आनंद ब्रह्म का संकेत है, ब्रह्म नहीं.
जो यहां अटक गया, उसका विकास रुक सकता है.
पंचकोष और चक्र: विरोध नहीं, पूरक
चक्र ऊर्जा केंद्र हैं. कोष अनुभव के क्षेत्र.
मूलाधार अन्नमय और प्राणमय से जुड़ा है. स्वाधिष्ठान और मणिपुर मनोमय को प्रभावित करते हैं. अनाहत विवेक को गहरा करता है. आज्ञा में विज्ञानमय साफ होता है. सहस्रार में आनंदमय झलक देता है.
आम गलतफहमियां
हर अनुभव कुंडलिनी नहीं होता. हर परेशानी साधना नहीं होती. हर शांति उपलब्धि नहीं होती.
पंचकोष की समझ साधक को संतुलित रखती है.
निष्कर्ष: सही नजरिया
कुंडलिनी जागरण कोई एक घटना नहीं है. यह अंदर की परतों का क्रमिक खुलना है.
पंचकोष इस यात्रा का नक्शा हैं.
शरीर बदले तो घबराएं नहीं. ऊर्जा चले तो पकड़ें नहीं. मन हिले तो डरें नहीं. समझ गहरी हो तो अहं न बनाएं. और शांति आए तो उसे अंतिम न मानें.
यही संतुलन साधना को सुरक्षित और सार्थक बनाता है.
धन्यवाद !



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