तुरीय अवस्था क्या है और कब आती है - चेतना की चौथी अवस्था का रहस्य

मुझे याद है जब पहली बार किसी ने मुझसे तुरीय अवस्था के बारे में पूछा था। मैंने सोचा था कि यह कोई जटिल दार्शनिक अवधारणा होगी, लेकिन जब मैंने इसे समझा तो पाया कि यह हमारे दैनिक जीवन से कितनी गहराई से जुड़ी हुई है। आज मैं आपके साथ इस अनुभव को साझा करना चाहता हूं।
तुरीय का मतलब क्या है?
सबसे पहले तो यह समझ लेते हैं कि तुरीय का मतलब क्या है। संस्कृत में "तुरीय" का अर्थ है "चौथा"। लेकिन यह कोई साधारण चौथी अवस्था नहीं है - यह चेतना की वह स्थिति है जो जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति (गहरी नींद) से परे है।
वैसे, मुझे लगता है कि हमारे पुराने ऋषि-मुनियों ने इसे "चौथा" इसलिए कहा क्योंकि वे जानते थे कि हम इंसान संख्याओं में सोचते हैं। लेकिन सच कहूं तो, तुरीय कोई अवस्था ही नहीं है - यह अवस्थाओं से परे की स्थिति है।
चेतना की तीन सामान्य अवस्थाएं
तुरीय को समझने के लिए पहले हमें चेतना की तीन सामान्य अवस्थाओं को समझना होगा:
1. जाग्रत अवस्था (जागना)
यह वह अवस्था है जिसमें आप अभी हैं। आपकी सभी इंद्रियां सक्रिय हैं, मन विचारों से भरा है, और आप बाहरी दुनिया से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। आंखें देख रही हैं, कान सुन रहे हैं, मन योजनाएं बना रहा है।
2. स्वप्न अवस्था (सपने देखना)
जब आप सो जाते हैं और सपने आते हैं, तो यह स्वप्न अवस्था है। यहां इंद्रियां तो बंद हैं, लेकिन मन अपनी कल्पनाओं से अनुभव बना रहा है। कभी-कभी तो सपने इतने जीवंत होते हैं कि लगता है जैसे वास्तविकता हो।
3. सुषुप्ति अवस्था (गहरी नींद)
यह वह अवस्था है जब आप गहरी नींद में होते हैं और कोई सपना भी नहीं आ रहा। न कोई विचार, न कोई अनुभव। बस शुद्ध विश्राम। जब आप इस नींद से उठते हैं तो कहते हैं, "वाह! कितनी अच्छी नींद आई।"
तुरीय अवस्था - चौथी स्थिति
अब आते हैं तुरीय पर। माण्डूक्य उपनिषद में इसका बहुत सुंदर वर्णन है। तुरीय वह स्थिति है जहां आप जागे हुए भी हैं, सोए हुए भी नहीं हैं, और सपने भी नहीं देख रहे। यह शुद्ध चेतना की अवस्था है।
मुझे एक बार एक साधक ने बताया था, "गुरुजी, तुरीय में जाना ऐसा है जैसे आप अपने ही घर में मेहमान बन जाएं।" बात तो सही कही थी उन्होंने।
तुरीय की विशेषताएं:
1. साक्षी भाव: आप सब कुछ देख रहे हैं लेकिन किसी चीज में उलझे नहीं हैं। जैसे आप एक फिल्म देख रहे हों - पूरी तरह जागरूक हैं लेकिन फिल्म के पात्र नहीं हैं।
2. निर्विकल्प स्थिति: मन में विकल्प नहीं चल रहे। "यह करूं या वह करूं" - ऐसी कोई द्वंद्व नहीं।
3. अद्वैत अनुभव: द्वैत का भाव समाप्त हो जाता है। "मैं" और "तू" का भेद मिट जाता है।
4. काल से परे: समय का अहसास नहीं रहता। न भूत, न भविष्य - बस शुद्ध वर्तमान।
तुरीय अवस्था कब आती है?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल - यह कब आती है? मेरे अनुभव में, तुरीय अवस्था के आने के कुछ खास समय और परिस्थितियां हैं:
1. गहरे ध्यान में
जब आप नियमित ध्यान करते हैं और धीरे-धीरे गहराई में जाते हैं, तो कभी-कभी अचानक एक ऐसी स्थिति आती है जहां न तो आप सो रहे होते हैं, न जाग रहे होते हैं। बस एक शुद्ध जागरूकता होती है।
मुझे याद है, एक साधक ने बताया था, "गुरुजी, ध्यान में बैठा था तो लगा जैसे मैं हूं भी और नहीं भी हूं। बड़ा अजीब अनुभव था।" यही तो तुरीय का स्वाद है।
2. प्राकृतिक सुंदरता के सामने
कभी-कभी जब आप किसी बहुत सुंदर दृश्य को देखते हैं - सूर्यास्त, पहाड़, या समुद्र - तो अचानक मन रुक जाता है। उस क्षण में न कोई विचार होता है, न कोई इच्छा। बस शुद्ध अनुभव।
3. संगीत या कला में डूबने पर
जब आप किसी मधुर संगीत में पूरी तरह डूब जाते हैं, या कोई कलाकृति देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, तो वह भी तुरीय का स्पर्श हो सकता है।
4. प्रेम की गहराई में
सच्चे प्रेम के क्षणों में भी तुरीय की झलक मिलती है। जब "मैं" और "तू" का भेद मिट जाता है और केवल प्रेम रह जाता है।
5. जीवन-मृत्यु के संकट में
कभी-कभी गहरे संकट के समय, जब सब कुछ रुक जाता है, तो भी तुरीय की अनुभूति हो सकती है। जैसे समय थम गया हो।
तुरीय अवस्था के लक्षण
जब तुरीय अवस्था आती है तो कुछ खास लक्षण दिखाई देते हैं:
शारीरिक लक्षण:
- सांस बहुत धीमी या कभी-कभी रुकी हुई सी लगती है
- हृदय गति शांत हो जाती है
- शरीर में एक अजीब सी स्थिरता आ जाती है
- कभी-कभी शरीर का अहसास ही नहीं रहता
मानसिक लक्षण:
- विचारों का प्रवाह रुक जाता है
- समय का अहसास नहीं रहता
- "मैं" का भाव कम हो जाता है या मिट जाता है
- एक गहरी शांति का अनुभव होता है
आध्यात्मिक लक्षण:
- सब कुछ एक लगने लगता है
- ब्रह्म या परमात्मा का अनुभव हो सकता है
- अनंत आनंद की अनुभूति
- ज्ञान की स्वतः उत्पत्ति
ओम् और तुरीय का संबंध
माण्डूक्य उपनिषद में ओम् के तीन अक्षरों - अ, उ, म - को तीन अवस्थाओं से जोड़ा गया है। अकार जाग्रत से, उकार स्वप्न से, और मकार सुषुप्ति से जुड़ा है। लेकिन तुरीय? वह इन तीनों के बाद आने वाली मौनता है - अमात्र।
जब आप ओम् का जाप करते हैं और अंत में जो मौनता आती है, वही तुरीय का प्रतीक है। वैसे, मुझे लगता है कि हमारे ऋषियों ने बहुत चतुराई से यह बात कही है।
तुरीय अवस्था कैसे प्राप्त करें?
अब सवाल यह है कि इस अवस्था को कैसे प्राप्त करें? सच कहूं तो, तुरीय को "प्राप्त" नहीं किया जाता - यह तो हमारा स्वभाव ही है। हमें बस उन चीजों को हटाना है जो इसे ढक रही हैं।
1. नियमित ध्यान अभ्यास
रोज कम से कम 20-30 मिनट ध्यान करें। शुरुआत में सांस पर ध्यान दें, फिर धीरे-धीरे गहराई में जाएं। ध्यान का सही तरीका सीखना बहुत जरूरी है।
2. प्राणायाम का अभ्यास
प्राणायाम से मन शांत होता है और तुरीय की तैयारी होती है। कुंडलिनी जागरण के लिए प्राणायाम का अभ्यास करें।
3. मौन का अभ्यास
दिन में कुछ समय मौन रहने का अभ्यास करें। बोलना बंद करने से मन भी शांत होने लगता है।
4. सत्संग और अध्ययन
अच्छे गुरु की संगति और उपनिषदों का अध्ययन करें। गुरु की खोज कैसे करें, यह भी जानना जरूरी है।
5. निष्काम कर्म
बिना फल की इच्छा के कर्म करने से मन निर्मल होता है और तुरीय की संभावना बढ़ती है।
तुरीय अवस्था में क्या होता है?
जब तुरीय अवस्था आती है तो एक अनोखा अनुभव होता है। मैंने कई साधकों से सुना है:
"गुरुजी, लगा जैसे मैं सब कुछ हूं और कुछ भी नहीं हूं।"
"ऐसा लगा जैसे समुद्र की लहर समुद्र में ही मिल गई हो।"
"सब कुछ एक ही चेतना का खेल लग रहा था।"
यह अवस्था कुछ सेकंड से लेकर कई घंटों तक रह सकती है। शुरुआत में यह बहुत कम समय के लिए आती है, लेकिन अभ्यास से इसकी अवधि बढ़ सकती है।
तुरीय और समाधि में अंतर
कई लोग पूछते हैं कि तुरीय और समाधि में क्या अंतर है? मुझे लगता है कि तुरीय समाधि का ही एक रूप है। समाधि की अवस्था में भी यही अनुभव होता है।
लेकिन एक बात है - तुरीय में आप पूरी तरह बेहोश नहीं होते। आप जागरूक रहते हैं, लेकिन साधारण जागरूकता से अलग। यह एक विशेष प्रकार की जागरूकता है।
आधुनिक विज्ञान और तुरीय
आजकल न्यूरोसाइंस भी इस पर काम कर रहा है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि गहरे ध्यान में मस्तिष्क की तरंगें बदल जाती हैं। अल्फा, बीटा, थीटा और डेल्टा तरंगों के अलावा एक और स्थिति होती है जो तुरीय से मिलती-जुलती है।
हालांकि विज्ञान अभी भी इसे पूरी तरह समझने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यह अच्छी बात है कि आधुनिक दुनिया भी इन प्राचीन सत्यों को मानने लगी है।
तुरीय अवस्था की चुनौतियां
तुरीय अवस्था का अनुभव करना आसान नहीं है। कुछ चुनौतियां हैं:
1. मन का विरोध
मन इस अवस्था का विरोध करता है क्योंकि यहां उसकी कोई भूमिका नहीं होती।
2. डर लगना
पहली बार जब यह अनुभव होता है तो डर लग सकता है। "कहीं मैं मर तो नहीं रहा?" - ऐसे विचार आ सकते हैं।
3. वापस आने की समस्या
कभी-कभी इस अवस्था से वापस आने में समय लगता है। इसलिए कुंडलिनी जागरण की सुरक्षा के बारे में जानना जरूरी है।
4. दैनिक जीवन में समायोजन
इस अनुभव के बाद सामान्य जीवन में वापस आना मुश्किल हो सकता है।
तुरीय अवस्था के फायदे
लेकिन इसके अनगिनत फायदे भी हैं:
1. गहरी शांति: मन को एक ऐसी शांति मिलती है जो शब्दों में बयान नहीं हो सकती।
2. आत्म-साक्षात्कार: अपने वास्तविक स्वरूप का पता चलता है।
3. भय का नाश: मृत्यु का डर समाप्त हो जाता है।
4. ज्ञान की प्राप्ति: बिना पढ़े-लिखे ही गहरे सत्य समझ में आने लगते हैं।
5. करुणा का विकास: सभी जीवों के प्रति प्रेम और करुणा बढ़ जाती है।
तुरीय अवस्था और कुंडलिनी
कुंडलिनी जागरण और तुरीय अवस्था का गहरा संबंध है। जब कुंडलिनी सहस्रार चक्र तक पहुंचती है, तो तुरीय अवस्था का अनुभव हो सकता है।
कई साधकों ने बताया है कि अजपा जाप के दौरान या अनाहत नाद सुनते समय तुरीय की झलक मिली है।
व्यावहारिक सुझाव
अगर आप तुरीय अवस्था का अनुभव करना चाहते हैं तो ये सुझाव काम आ सकते हैं:
1. धैर्य रखें
यह अवस्था जल्दबाजी में नहीं आती। धैर्य और निरंतर अभ्यास जरूरी है।
2. अपेक्षा न रखें
जितनी अपेक्षा रखेंगे, उतनी ही देर होगी। बस अभ्यास करते रहें।
3. गुरु की शरण लें
बिना गुरु के कुंडलिनी जागरण संभव है, लेकिन गुरु का मार्गदर्शन बहुत मददगार होता है।
4. जीवनशैली सुधारें
सात्विक भोजन, नियमित दिनचर्या, और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
5. सेवा करें
निस्वार्थ सेवा से मन शुद्ध होता है और तुरीय की संभावना बढ़ती है।
सावधानियां
तुरीय अवस्था के अभ्यास में कुछ सावधानियां भी रखनी चाहिए:
- अकेले में अभ्यास न करें, खासकर शुरुआत में
- किसी अनुभवी गुरु का मार्गदर्शन लें
- शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें
- कुंडलिनी जागरण अधूरा रह जाए तो क्या करना है, यह जान लें
निष्कर्ष
तुरीय अवस्था कोई कल्पना या दर्शन की बात नहीं है - यह एक वास्तविक अनुभव है जो हर इंसान कर सकता है। यह हमारा मूल स्वभाव है, बस हमें इसे पहचानना है।
मुझे लगता है कि आज के तनावपूर्ण समय में तुरीय अवस्था की जरूरत और भी बढ़ गई है। यह न केवल व्यक्तिगत शांति देती है, बल्कि पूरे समाज के कल्याण में भी योगदान देती है।
याद रखिए, तुरीय कोई मंजिल नहीं है - यह एक यात्रा है। और यह यात्रा उसी क्षण शुरू हो जाती है जब आप अपने भीतर झांकने का साहस करते हैं।
वैसे, अगर आप इस विषय पर और गहराई से जानना चाहते हैं तो सुषुम्ना नाड़ी और भ्रूवर गुफा के बारे में भी पढ़ें। ये सभी विषय आपस में जुड़े हुए हैं।
तुरीय अवस्था का अनुभव करना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। यह वह अनुभव है जो आपको बताता है कि आप कौन हैं, कहां से आए हैं, और कहां जाना है।
तो फिर देर किस बात की? आज ही से अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू करें। कौन जाने, कब आपको तुरीय की पहली झलक मिल जाए!
स्रोत और संदर्भ:
- माण्डूक्य उपनिषद
- पतंजलि योग सूत्र
- आधुनिक न्यूरोसाइंस अनुसंधान



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