ध्यान करते समय आंखों से पानी क्यों आने लगता है

ध्यान करते समय आंखों में आंसू क्यों आते हैं
यह बात मैं सीधे अपने और दूसरे साधकों के अनुभव से लिख रहा हूं, किसी किताब या सिद्धांत से नहीं. क्योंकि जब यह अनुभव पहली बार होता है, तो इंसान थोड़ा घबरा जाता है. मैं खुद घबराया था.
मैं ध्यान में बैठा था. न कोई दुख की बात सोच रहा था, न कोई भावुक संगीत चल रहा था. बस सांस पर ध्यान था. कुछ मिनट बीते और अचानक महसूस हुआ कि आंखें गीली होने लगती हैं और आंसू बहने लगते हैं. पहले लगा शायद आंखों में जलन है, फिर समझ आया कि यह आंसू हैं.
उस समय मन में कोई भावना साफ तौर पर नहीं थी. यही बात सबसे ज्यादा उलझाने वाली होती है. अगर दुख होता, तो रोना समझ आता. लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं था.
"कभी-कभी ध्यान जवाब नहीं देता, बस भीतर जमी चीजों को हिलाना शुरू कर देता है."
ध्यान में आंखों से आंसू आना असल में क्या बताता है
जब ध्यान में आंखों से आंसू आते हैं, तो इसका मतलब है कि भीतर कुछ हरकत में आया है. जरूरी नहीं कि वह दुख ही हो. कई बार वह बस वर्षों से बनी हुई कठोरता होती है, जो अब ढीली पड़ रही होती है.
हम रोजमर्रा की जिंदगी में खुद को संभाल कर रखते हैं. बाहरी दुनिया के नियमों के मुताबिक व्यवहार करना और खुद को नियंत्रित रखना हमारी आदत बन गई है. ध्यान में यह पकड़ धीरे-धीरे छूटती है और शरीर अपनी प्रतिक्रिया दिखाता है. बहुत से लोगों के लिए वह प्रतिक्रिया आंखों से आंसू होती है.
"आंसू हमेशा दर्द का परिणाम नहीं होते, कई बार वे सुरक्षा का संकेत होते हैं."
ध्यान करते समय आंखों से पानी आने लगता है तो क्यों
जब ध्यान गहराता है, तो सबसे पहले सांस बदलती है, मांसपेशियां ढीली पड़ने लगती हैं और तंत्रिका तंत्र शांत होने लगता है.
इस पूरी प्रक्रिया में शरीर वह सब छोड़ने लगता है जिसे वह बेवजह पकड़े हुए था. कई लोगों को उसी समय आंखों में भारीपन महसूस होता है.
मैंने खुद यह नोट किया है कि आंसू आने के समय मन में कोई तेज भावना नहीं होती. न खुशी, न उदासी. बस एक तरह की खाली शांति होती है.
इसलिए यह कहना ज्यादा ठीक है कि यह रोना नहीं, बल्कि रिलीज है.
ध्यान में सांस अपने आप रुकने लगे तो क्या करें?
दबी हुई भावनाएं और ध्यान में उनका बाहर आना
जो भावनाएं हम दबाते हैं, वही धीरे-धीरे बाहर आती हैं. दुख, डर, क्रोध, अधूरी बातें.
ध्यान के दौरान जब शरीर को सुरक्षित माहौल मिलता है, तब ये जकड़न ढीली पड़ती है. और कई बार उसका इजहार आंसुओं के रूप में होता है.
"जिसे हम सालों दबाते हैं, वह ध्यान में धीरे से बाहर निकलता है."
बिना किसी दुख के ध्यान में आंसू क्यों आते हैं

यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता है. क्योंकि इंसान सोचता है कि अगर दुख नहीं है, तो आंसू क्यों.
असल में हर प्रतिक्रिया भावना से नहीं जुड़ी होती. शरीर की अपनी स्मृति होती है. तनाव, डर और दबाव शरीर में सालों तक टिके रह सकते हैं.
जब ध्यान में शरीर गहराई से आराम की अवस्था में जाता है, तो ये पुराने जमा हुए तनाव बाहर निकलते हैं.
"हर आंसू का मतलब दुख नहीं होता, कुछ आंसू बस रिलीज होते हैं."
ध्यान में प्रकाश क्यों नहीं दिखता?
आंखें और ध्यान का सीधा संबंध
आंखें मस्तिष्क से बहुत नजदीकी तरीके से जुड़ी होती हैं. जब तंत्रिका तंत्र सतर्क अवस्था से बाहर आता है और आराम की स्थिति में जाता है, तो आंखों पर भी उसका असर पड़ता है.
जैसे जम्हाई लेते समय या गहरी थकान के बाद आंखों में पानी आ जाता है, वैसे ही ध्यान में भी यह प्रतिक्रिया हो सकती है.
इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है, लेकिन ध्यान में होने की वजह से लोग इसे ज्यादा महत्व देने लगते हैं.
ध्यान में शांति या करुणा से आने वाले आंसू
हर आंसू किसी भारी भावना से नहीं आता. कई बार ध्यान में ऐसी शांति महसूस होती है जिसे शब्द नहीं पकड़ पाते.
वह शांति इतनी मुलायम होती है कि आंखों से आंसू बह सकते हैं. इन आंसुओं के बाद अक्सर मन में हल्कापन रहता है, खालीपन नहीं.
क्या इसे कुंडलिनी या आज्ञा चक्र से जोड़ना सही है
कुछ परंपराओं में ध्यान के दौरान आने वाले हर अनुभव को चक्रों से जोड़ दिया जाता है. आंसू आने को भी.
कई बार भ्रूमध्य में दबाव के साथ आंसू आ सकते हैं, यह सच है. लेकिन हर अनुभव को आध्यात्मिक नाम देना जरूरी नहीं.
अनुभव को अनुभव की तरह देखना ज्यादा संतुलित तरीका है.
ध्यान में आंसू आना अच्छा है या बुरा
यह न अच्छा है, न बुरा. यह बस होता है.

समस्या तब शुरू होती है जब साधक इसे पकड़ लेता है या रोकने की कोशिश करता है.
ध्यान का रास्ता इन दोनों के बीच होता है. जो हो रहा है, उसे होने देना.
ध्यान के दौरान आंसू आएं तो क्या करना चाहिए
जब आंखों से आंसू आएं, तो सबसे सही काम है उन्हें नोटिस करना और फिर ध्यान को वापस अपने अभ्यास पर ले आना.
न खास बनने की जरूरत है, न डरने की.
कुछ मिनटों बाद आंसू खुद ही रुक जाते हैं, अगर आप उनसे लड़ें नहीं.
कब थोड़ा सावधान होने की जरूरत होती है
अगर आंखों में लगातार जलन है, या ध्यान के बाहर भी बार बार आंसू आते हैं, तो यह सिर्फ ध्यान से जुड़ा मामला नहीं भी हो सकता.
इसी तरह, अगर ध्यान के बाद बहुत ज्यादा उदासी या असंतुलन बना रहता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
ध्यान जीवन को हल्का बनाने के लिए है, भारी करने के लिए नहीं.
अंत में सीधी बात
ध्यान में आंखों से आंसू आना कोई परीक्षा नहीं है, न कोई उपलब्धि.
यह बस इस बात का संकेत हो सकता है कि आप थोड़ा रुक गए हैं, थोड़ा ढीले पड़े हैं.
अनुभव आते जाएंगे, जाते जाएंगे.
साधना का मतलब उन्हें पकड़ना नहीं, बल्कि उनके बीच स्थिर रहना सीखना है.
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