Dhyan Sadhana

प्राण शक्ति क्या है? जो 99% लोग नहीं जानते.

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि रात को पूरे आठ घंटे सोए, सुबह उठे, और फिर भी लगा जैसे नींद ही नहीं आई? शरीर भारी, मन उदास, कोई काम करने की इच्छा नहीं। चाय पी, फिर भी वही सुस्ती।

मैंने जब पहली बार किसी बुजुर्ग साधक से यह बात कही, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा "बेटा, यह नींद की कमी नहीं है। यह प्राण शक्ति की कमी है।"

उस वक्त मुझे समझ नहीं आया। लेकिन जैसे-जैसे साधना गहरी हुई, यह बात बिल्कुल साफ हो गई। और आज जो मैं आपसे share करने वाला हूँ, वो ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं है यहाँ तक कि जो लोग योग करते हैं, उन्हें भी नहीं।


प्राण शक्ति वो नहीं है जो आप सोचते हैं

सबसे पहले एक गलतफहमी दूर करते हैं।

बहुत लोग सोचते हैं कि प्राण मतलब ऑक्सीजन है। या सांस है। यह सच नहीं है और यही वो गलती है जो प्राण को समझने से रोकती है।

प्राण वो सूक्ष्म ऊर्जा है जो सांस के पीछे काम करती है। सांस तो बस एक माध्यम है जैसे बिजली के तार में करंट बहता है, वैसे ही सांस में प्राण बहता है। तार नहीं है करंट, करंट अलग चीज़ है।

अथर्ववेद में कहा गया है "प्राण एव प्रजानां आयुः" यानी प्राण ही प्राणियों का जीवन है। सिर्फ सांस नहीं, बल्कि वो चेतना जो सांस को चलाती है, हृदय को धड़काती है, पाचन को संचालित करती है वो सब प्राण है।

सोचिए जब कोई मर जाता है, तो उसके शरीर में ऑक्सीजन तो होती है, फेफड़े भी होते हैं। लेकिन सांस नहीं चलती। क्यों? क्योंकि प्राण चला गया। प्राण ही वो intelligence है जो शरीर को जीवित रखती है।

संस्कृत में "प्र" का अर्थ है जो भरता है, और "अन" का अर्थ है गति। यानी प्राण = वो ऊर्जा जो भरती है और गतिशील रहती है। यह ब्रह्मांड में हर जगह है हवा में, पानी में, भोजन में, सूर्य की किरणों में। और हमारे शरीर में 72,000 सूक्ष्म नाड़ियों के माध्यम से बहती है।


पाँच प्राण शरीर की पाँच अलग-अलग ऊर्जाएँ

यहाँ एक और बात है जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते। प्राण ऊर्जा एक नहीं, पाँच प्रकार की होती है। इन्हें पंच प्राण वायु कहते हैं। और हर एक का काम अलग है।

पहला प्राण वायु। यह छाती के क्षेत्र में रहता है। सांस लेना, हृदय का धड़कना, बाहर से ऊर्जा ग्रहण करना यह सब इसी का काम है। जब यह कमज़ोर होता है, तो सांस उथली हो जाती है, दिल बेचैन रहता है।

प्राण और कुंडलिनी एक ही सिक्के के दो पहलू
AI Genarated Image

दूसरा अपान वायु। यह नाभि के नीचे, श्रोणि क्षेत्र में काम करता है। शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकालना, मल-मूत्र का उत्सर्जन, और ज़मीन से जुड़ाव यह सब अपान का काम है। जब यह असंतुलित होता है, तो कब्ज़, पीठ दर्द, और मानसिक अस्थिरता आती है।

तीसरा समान वायु। नाभि के पास रहता है। पाचन, पोषण का अवशोषण, और शरीर में ऊर्जा का संतुलन यह समान का काम है। जब यह ठीक नहीं होता, तो खाना खाने के बाद भी थकान लगती है।

चौथा उदान वायु। यह गले के क्षेत्र में रहता है और ऊपर की दिशा में काम करता है। बोलना, विचार करना, और यह सबसे महत्वपूर्ण बात है कुंडलिनी शक्ति को ऊपर उठाना यह उदान वायु का काम है। जब उदान वायु जागृत होती है और सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित होती है, तभी कुंडलिनी का उत्थान होता है।

पाँचवाँ व्यान वायु। यह पूरे शरीर में फैला हुआ है। रक्त संचार, तंत्रिका तंत्र, और सभी अंगों का समन्वय यह व्यान का काम है। यह एक तरह से सभी प्राणों को जोड़ने वाला धागा है।

वैसे, इन पाँचों में से उदान वायु को मैं सबसे रहस्यमय मानता हूँ। क्योंकि यही वो कड़ी है जो प्राण शक्ति को कुंडलिनी जागरण से जोड़ती है।


प्राण और कुंडलिनी एक ही सिक्के के दो पहलू

अब यहाँ वो बात आती है जो शायद आपने कहीं नहीं पढ़ी होगी।

कुंडलिनी जागरण को लोग अक्सर एक अलग, रहस्यमय घटना की तरह देखते हैं। जैसे कोई बाहरी शक्ति अचानक जाग जाती है। लेकिन सच यह है कि कुंडलिनी शक्ति असल में सुप्त प्राण ही है।

हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियाँ हैं सूक्ष्म ऊर्जा चैनल। इन्हीं नाड़ियों में प्राण बहता है। जब प्राण का प्रवाह इड़ा और पिंगला नाड़ियों में होता है, तो हम सामान्य जीवन जीते हैं। लेकिन जब यही प्राण सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करता है तब कुंडलिनी जागती है।

मूलाधार चक्र में जो कुंडलिनी शक्ति साढ़े तीन कुंडल मारकर सोई हुई है वो कुछ और नहीं, बल्कि वर्षों से संचित, सुप्त प्राण ऊर्जा है। जब साधना के माध्यम से उदान वायु को जागृत किया जाता है, तो यही प्राण ऊर्जा ऊपर की ओर उठती है और सुषुम्ना के रास्ते सहस्रार तक पहुँचती है।

इसीलिए जो लोग प्राण शक्ति को बढ़ाने पर काम करते हैं, उनकी कुंडलिनी साधना स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ती है। और जो सिर्फ कुंडलिनी जागरण की कोशिश करते हैं बिना प्राण को समझे वो अक्सर अटक जाते हैं।

हिमालयन इंस्टीट्यूट के स्वामी राम ने इसे बहुत सुंदर तरीके से कहा है "प्राणायाम की तकनीकें इड़ा और पिंगला को शांत करने और सुषुम्ना को खोलने के लिए हैं, ताकि प्राण इस मध्य मार्ग से बह सके।" जब सुषुम्ना खुलती है, तो मूलाधार में सोई हुई कुंडलिनी जागती है।


आधुनिक जीवन प्राण को कैसे चुरा रहा है

यह वो हिस्सा है जो मुझे सबसे ज़रूरी लगता है। और जो किसी भी हिंदी लेख में ठीक से नहीं बताया गया।

मोबाइल और सोशल मीडिया। जब आप Instagram scroll करते हैं, तो आपका ध्यान हर दो सेकंड में एक नई चीज़ पर जाता है। प्राण ध्यान के साथ चलता है जहाँ ध्यान, वहाँ प्राण। जब ध्यान बिखरा हुआ है, तो प्राण भी बिखर जाता है। यही कारण है कि घंटों फोन चलाने के बाद आप थका हुआ महसूस करते हैं आपने कुछ किया नहीं, लेकिन प्राण खर्च हो गया।

प्रोसेस्ड फूड। ताज़ा फल, सब्ज़ियाँ, अंकुरित अनाज इनमें प्राण होता है। पैकेट बंद, प्रिज़र्वेटिव वाला खाना इसमें प्राण नहीं होता। जब आप मृत भोजन खाते हैं, तो शरीर को calories तो मिलती हैं, लेकिन प्राण नहीं। धीरे-धीरे प्राणमय कोश कमज़ोर होता जाता है।

क्रोनिक स्ट्रेस। तनाव में cortisol हार्मोन बढ़ता है। यह शरीर की fight-or-flight response है। इस अवस्था में प्राण बहुत तेज़ी से खर्च होता है जैसे गाड़ी को अचानक full throttle पर चलाना। थोड़ी देर में टैंक खाली।

नकारात्मक भावनाएँ। क्रोध, ईर्ष्या, भय ये सब प्राण को जलाती हैं। एक बड़ा झगड़ा करने के बाद आप इतने थके क्यों होते हैं? क्योंकि उस दौरान प्राण की खपत बहुत ज़्यादा हुई।

वीर्य का अपव्यय। यह बात थोड़ी संवेदनशील है, लेकिन वैदिक परंपरा में इसे बहुत महत्व दिया गया है। वीर्य में प्राण की सबसे घनी मात्रा होती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से यह प्राण संचित होता है और साधना में काम आता है।


कैसे पहचानें कि आपकी प्राण शक्ति कम हो रही है

कुछ संकेत हैं जो बताते हैं कि प्राण ऊर्जा घट रही है।

पूरी नींद के बाद भी थकान यह सबसे पहला और सबसे स्पष्ट संकेत है। नींद शरीर को आराम देती है, लेकिन प्राण को नहीं भरती जब तक नींद गहरी और सात्विक न हो।

नकारात्मक विचारों का loop। एक ही बात बार-बार मन में घूमती रहे, चिंता न जाए यह प्राणमय कोश की कमज़ोरी का संकेत है।

पाचन की समस्याएँ गैस, अपच, खाने के बाद भारीपन समान वायु का असंतुलन।

बार-बार बीमार पड़ना। कमज़ोर immunity का सीधा संबंध कमज़ोर प्राण से है।

किसी काम में मन न लगना। जब प्राण कम होता है, तो motivation भी कम हो जाती है। सब कुछ बेकार लगने लगता है।

हो सकता है कि आप इनमें से कुछ लक्षण अभी भी महसूस कर रहे हों। अगर हाँ, तो यह लेख आपके लिए ही है।


प्राण शक्ति बढ़ाने के असली तरीके

प्राणायाम सबसे सीधा रास्ता। अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भ्रामरी ये सिर्फ साँस लेने के व्यायाम नहीं हैं। ये प्राण को नाड़ियों में शुद्ध करके प्रवाहित करने की विधियाँ हैं। कुंडलिनी जागरण के लिए 5 प्रभावी प्राणायाम के बारे में हमने विस्तार से लिखा है वहाँ आप step-by-step तरीका जान सकते हैं।

सात्विक आहार। ताज़ा फल, हरी सब्ज़ियाँ, अंकुरित अनाज, दूध ये सब प्राण से भरपूर हैं। जितना ताज़ा खाना, उतना ज़्यादा प्राण। पकाने के बाद भी जितना जल्दी खाएँ, उतना बेहतर। और हाँ प्रेम से बना खाना भी प्राण बढ़ाता है। यह कोई कविता नहीं है, यह सच है।

प्रकृति में समय। सुबह की धूप में बैठना, नंगे पाँव घास पर चलना (earthing), पेड़-पौधों के पास रहना ये सब प्राण को directly recharge करते हैं। प्रकृति प्राण का सबसे बड़ा स्रोत है। आजकल हम इतने indoor हो गए हैं कि प्रकृति से हमारा संपर्क लगभग टूट गया है और इसका सीधा असर प्राण पर पड़ता है।

अजपा जाप So-Ham। यह मेरी सबसे पसंदीदा विधि है। हर सांस के साथ "सो" (श्वास लेते हुए) और "हम" (श्वास छोड़ते हुए) यह अपने आप होता रहता है, चाहे आप जानें या न जानें। जब इसे सचेत रूप से किया जाए, तो प्राण की गति सुषुम्ना की ओर होने लगती है। अजपा जाप क्या है और इसे कैसे करें इस पर हमारा विस्तृत लेख ज़रूर पढ़ें।

ध्यान। ध्यान का सही तरीका जानना बहुत ज़रूरी है। ध्यान में जब मन एकाग्र होता है, तो बिखरा हुआ प्राण वापस केंद्र में आता है। यह प्राण संचय की सबसे गहरी विधि है। और जो लोग सोचते हैं कि ध्यान में बैठना मुश्किल है उनके लिए बस इतना कहूँगा: शुरुआत 5 मिनट से करें। बस।

सद्गुरु का 24 मिनट का नियम। सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही है अगर आप किसी सुखद अनुभव को 24 मिनट तक बनाए रख सकें, तो वह आपके पूरे प्राणमय कोश में समा जाता है। इसका मतलब यह है कि खुशी, कृतज्ञता, प्रेम ये सिर्फ भावनाएँ नहीं हैं, ये प्राण को recharge करने के तरीके हैं। अगली बार जब कुछ अच्छा लगे उस अनुभव में थोड़ी देर रुकिए। उसे जाने मत दीजिए।

गहरी नींद। नींद में शरीर प्राण को recharge करता है लेकिन सिर्फ तब जब नींद सच में गहरी हो। रात को मोबाइल बंद करके सोना, सोने से पहले ध्यान करना ये छोटी-छोटी बातें नींद की quality को बदल देती हैं।


प्राणमय कोश वो परत जो शरीर और आत्मा के बीच है

हमारे शरीर के पाँच कोश हैं अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनंदमय। प्राणमय कोश दूसरा कोश है यह स्थूल शरीर और मन के बीच की परत है।

जब प्राणमय कोश स्वस्थ होता है, तो शरीर और मन दोनों ठीक रहते हैं। जब यह कमज़ोर होता है, तो पहले मन में नकारात्मकता आती है, फिर शरीर में बीमारी। इसीलिए कहते हैं कि ज़्यादातर बीमारियाँ पहले प्राणमय कोश में आती हैं, फिर स्थूल शरीर में।

पंचकोश और कुंडलिनी जागरण में उनकी भूमिका के बारे में हमने एक अलग लेख में विस्तार से बताया है। अगर आप कुंडलिनी साधना में गंभीर हैं, तो वो लेख ज़रूर पढ़ें।


तो अब क्या करें?

सच कहूँ तो, प्राण शक्ति को बढ़ाना कोई एक दिन का काम नहीं है। यह एक जीवनशैली है।

लेकिन शुरुआत बहुत सरल है। कल सुबह उठकर बस 10 मिनट अनुलोम-विलोम करें। फोन को एक घंटे के लिए दूर रखें। ताज़ा फल खाएँ। नंगे पाँव घास पर चलें।

ये छोटी-छोटी बातें हैं। लेकिन जब ये आदत बन जाती हैं, तो प्राणमय कोश धीरे-धीरे भरने लगता है। और जब प्राण पर्याप्त होता है तब ध्यान गहरा होता है, कुंडलिनी साधना आगे बढ़ती है, और जीवन में एक अलग ही ऊर्जा आती है।

मेरे अनुभव में, जिस दिन से मैंने प्राण को समझा और उसे बचाना शुरू किया उस दिन से साधना में एक नई गहराई आई। वो थकान जो बिना कारण रहती थी, धीरे-धीरे कम होने लगी। और सबसे बड़ी बात कुंडलिनी जागरण की दिशा में जो अटकाव था, वो खुलने लगा।

प्राण शक्ति वो नींव है जिस पर पूरी आध्यात्मिक साधना टिकी है। इसे समझे बिना, कुंडलिनी को जगाने की कोशिश ऐसी है जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी चलाने की कोशिश।

अब आप जानते हैं। अब आगे बढ़ने का समय है।

Comments