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श्री विद्या और कुंडलिनी जागरण. वो संबंध जो कोई नहीं बताता

Parsh Chavan
Parsh Chavan Shree Vidya

एक सवाल जो मुझसे बहुत साधक पूछते हैं "भाई, मैं कुंडलिनी जागरण के लिए अलग से साधना करूँ, या श्री विद्या की दीक्षा ले लूँ? दोनों में से क्या ज़्यादा ज़रूरी है?"

सच कहूँ तो, यह सवाल सुनकर मुझे हमेशा थोड़ी हँसी आती है। इसलिए नहीं कि सवाल गलत है बल्कि इसलिए कि यह ऐसा है जैसे कोई पूछे "पानी पीऊँ या प्यास बुझाऊँ?" दोनों एक ही बात हैं। श्री विद्या और कुंडलिनी जागरण ये दो अलग रास्ते नहीं हैं। ये एक ही यात्रा के दो नाम हैं।

लेकिन यह बात इतनी सरलता से कहीं explain नहीं होती। इंटरनेट पर श्री विद्या के बारे में जो भी मिलता है, वह या तो बहुत ऊपरी है "श्री यंत्र रखो, लक्ष्मी आएगी" या इतना गूढ़ है कि समझ ही नहीं आता। और कुंडलिनी जागरण के बारे में जो मिलता है, उसमें श्री विद्या का ज़िक्र लगभग नहीं होता।

तो आज इस लेख में वो बात करते हैं जो कोई नहीं बताता श्री विद्या और कुंडलिनी जागरण का वह गहरा, अटूट संबंध जो हज़ारों साल पुराने शास्त्रों में छुपा है।


दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं

पहले एक बुनियादी बात समझते हैं।

कुंडलिनी जागरण का मतलब है मूलाधार चक्र में सोई हुई वह दिव्य शक्ति जो जागकर सुषुम्ना नाड़ी के रास्ते सहस्रार तक पहुँचती है। यह शक्ति ही कुंडलिनी है साढ़े तीन लपेटों में कुंडलित, सर्पिणी की तरह।

और श्री विद्या क्या है? श्री विद्या वह सम्पूर्ण आध्यात्मिक विज्ञान है जो देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी की उपासना के माध्यम से इसी सोई हुई शक्ति को जगाने का सबसे व्यवस्थित, सबसे सुरक्षित और सबसे गहरा मार्ग है।

मतलब कुंडलिनी वह लक्ष्य है जिसे जगाना है। और श्री विद्या वह विज्ञान है जो उसे जगाता है।

अब श्री यंत्र की बात करें। श्री यंत्र के एकदम केंद्र में एक बिंदु है वह छोटा सा बिंदु जो पूरे यंत्र का हृदय है। तांत्रिक शास्त्रों में यह बिंदु मूलाधार में सोई हुई कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। और नवावरण पूजा में जो यात्रा होती है बाहर से अंदर की ओर, आवरण दर आवरण वह असल में कुंडलिनी की मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा का ही प्रतिबिंब है।

यानी जब आप श्री यंत्र की पूजा करते हैं, तो आप अपने ही शरीर के भीतर की उस यात्रा को बाहर से साकार कर रहे होते हैं। यह कोई metaphor नहीं है यह शाब्दिक सत्य है।

कुंडलिनी और तंत्र के इस गहरे संबंध को समझना हो तो यह लेख भी पढ़ें।


श्री यंत्र और सात चक्रों का सीधा नक्शा

यह वह हिस्सा है जो मुझे सबसे ज़्यादा fascinating लगता है और जो लगभग कहीं हिंदी में ठीक से explain नहीं हुआ।

श्री यंत्र के नौ आवरण हैं। और ये नौ आवरण हमारे शरीर के सात चक्रों से और उससे भी आगे की दो उच्च अवस्थाओं से सीधे जुड़े हैं। बाहर से अंदर की यात्रा नीचे से ऊपर की यात्रा है।

श्री यंत्र और सात चक्रों का सीधा नक्शा

पहला आवरण भूपुर (तीन वर्ग): यह सबसे बाहरी आवरण है। तीन concentric वर्ग, चारों दिशाओं में द्वार। यह पृथ्वी तत्व का प्रतीक है स्थूल जगत। शरीर में यह मूलाधार चक्र है। यहीं कुंडलिनी सोई हुई है। जब आप पूजा में भूपुर पर पहुँचते हैं, तो आप उस जगह को जगा रहे होते हैं जहाँ से पूरी यात्रा शुरू होती है।

दूसरा आवरण षोडशदल (16 पंखुरी कमल): सोलह पंखुरियाँ सोलह आकर्षण शक्तियाँ। यह इच्छाओं और संवेदनाओं का क्षेत्र है। शरीर में यह स्वाधिष्ठान चक्र है। यहाँ साधक को अपनी इच्छाओं को दबाना नहीं है समझना है। इच्छा भी शक्ति का ही एक रूप है।

तीसरा आवरण अष्टदल (8 पंखुरी कमल): आठ पंखुरियाँ अष्ट लक्ष्मी की शक्तियाँ। यह अभिव्यक्ति, संकल्प और अग्नि का क्षेत्र है। शरीर में यह मणिपुर चक्र है। यहाँ इच्छाशक्ति और भय दोनों रहते हैं। यह अग्नि या तो अशुद्धियाँ जलाती है, या खुद को।

चौथा आवरण चतुर्दश (14 त्रिकोण): चौदह त्रिकोण चेतना के चौदह सूक्ष्म उपकरण। यह वह जगह है जहाँ साधक और देवी का पहला वास्तविक स्पर्श होता है। शरीर में यह अनाहत चक्र है। यहाँ कुछ बदलता है "मैं" से "हम" की यात्रा शुरू होती है।

पाँचवाँ आवरण बहिर्दशार (बाहरी 10 त्रिकोण): दस त्रिकोण देवी की दस गतिशील शक्तियाँ। यह वाणी, मंत्र और सत्य का क्षेत्र है। शरीर में यह विशुद्धि चक्र है। यहाँ मंत्र जाप सिर्फ यांत्रिक नहीं रहता वह समर्पण बन जाता है।

छठा आवरण अंतर्दशार (भीतरी 10 त्रिकोण): यह दस सिद्धि-शक्तियों का क्षेत्र है। और यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात है यह आवरण आज्ञा चक्र से जुड़ा है, जिसे गुरु-द्वार कहते हैं। यहीं गुरु की शक्ति साधक के सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करती है। यही कारण है कि श्री विद्या में गुरु दीक्षा इतनी महत्वपूर्ण है बिना गुरु के यह द्वार नहीं खुलता।

सातवाँ आवरण अष्ट त्रिकोण (8 त्रिकोण): आठ मातृकाएँ वे शक्तियाँ जो व्यक्तिगत अहंकार का विसर्जन करती हैं। यह सहस्रार के आसपास का क्षेत्र है। यहाँ "मैं" पतला होने लगता है।

आठवाँ आवरण त्रिकोण (मूल शिव-शक्ति त्रिकोण): यह वह मूल ज्यामिति है जिससे पूरा यंत्र बना है ऊपर की ओर शिव त्रिकोण, नीचे की ओर शक्ति त्रिकोण। यह परा-चक्र है शिव और शक्ति का प्रथम मिलन। यहाँ कोई तकनीक काम नहीं करती, सिर्फ समर्पण।

नौवाँ आवरण बिंदु: वह एक बिंदु। ब्रह्मरंध्र। परम चेतना। जहाँ पूजा करने वाला और जिसकी पूजा हो रही है दोनों एक हो जाते हैं।

सोचिए यह पूरा नक्शा आपके अपने शरीर का नक्शा है। जब आप श्री यंत्र की नवावरण पूजा करते हैं, तो आप अपनी ही कुंडलिनी यात्रा को बाहर से साकार कर रहे होते हैं।

सुषुम्ना नाड़ी और इस यात्रा के मार्ग को विस्तार से समझने के लिए यह लेख पढ़ें।


पंचदशी मंत्र के तीन कूट और तीन ग्रंथियाँ यहाँ असली रहस्य है

अब वह बात जो मुझे सबसे ज़्यादा चौंकाती है।

श्री विद्या का मूल मंत्र है पंचदशी मंत्र 15 अक्षरों का। यह तीन भागों में बँटा है जिन्हें कूट कहते हैं। और ये तीन कूट सीधे उन तीन ग्रंथियों से जुड़े हैं जो कुंडलिनी के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं।

पंचदशी मंत्र के तीन कूट और तीन ग्रंथियाँ यहाँ असली रहस्य है

योगकुंडल्युपनिषद् में एक श्लोक है जो इस पूरे रहस्य को खोलता है:

ज्वलनाघातपवनाघादोरुन्निद्रितोऽहितोऽहिराट्। ब्रह्मग्रन्थि ततो भित्वा विष्णुग्रन्थि भिनत्त्यतः। रुद्र ग्रन्थि च भित्त्वैव कमलानि भिनत्ति षट्। सहस्रकमले शक्तिः शिवेन सह मोदते।। सैवावस्था परा ज्ञेवा सैव निर्वृतिकारणा।।

अर्थ: अग्नि और प्राणवायु के प्रहार से जागी हुई कुंडलिनी ब्रह्म ग्रंथि को भेदकर, फिर विष्णु ग्रंथि को भेदकर, फिर रुद्र ग्रंथि को भेदकर छह कमलों (चक्रों) को पार करती है। और सहस्रार में शिव के साथ आनंद में विराजती है। यही परा अवस्था है, यही मोक्ष का कारण है।

अब देखिए पंचदशी मंत्र के तीन कूट इन तीन ग्रंथियों से कैसे जुड़े हैं:

वाग्भव कूट यह पंचदशी का पहला भाग है। यह देवी के मस्तक से नाभि तक के स्वरूप का प्रतीक है। और यह ब्रह्म ग्रंथि को खोलता है जो मूलाधार और स्वाधिष्ठान के बीच स्थित है। ब्रह्म ग्रंथि माया का सबसे पहला और सबसे मज़बूत बंधन है भौतिक सुखों और जड़ता का। जब यह खुलती है, तो साधक की चेतना पहली बार ऊपर उठने लगती है।

कामराज कूट यह दूसरा भाग है। देवी के नाभि से घुटनों तक के स्वरूप का प्रतीक। यह विष्णु ग्रंथि को खोलता है जो मणिपुर और अनाहत के बीच है। विष्णु ग्रंथि भावनात्मक बंधनों और रिश्तों की आसक्ति का केंद्र है। यहाँ खुलने पर हृदय में एक अजीब सी विशालता आती है।

शक्ति कूट यह तीसरा भाग है। देवी के घुटनों से पैरों तक के स्वरूप का प्रतीक। यह रुद्र ग्रंथि को खोलता है जो विशुद्धि और आज्ञा के बीच है। रुद्र ग्रंथि अहंकार का सबसे सूक्ष्म और सबसे ज़िद्दी बंधन है "मैं साधक हूँ", "मुझे ज्ञान है" यह भाव भी एक बंधन है। जब यह खुलती है, तो तीसरी आँख जागने लगती है।

यही कारण है कि पंचदशी मंत्र को कुंडलिनी जागरण का सबसे शक्तिशाली और व्यवस्थित उपकरण माना जाता है। यह मंत्र तीनों ग्रंथियों पर एक साथ काम करता है क्रमिक रूप से, सुरक्षित रूप से।

तीसरी आँख खुलने के लक्षण जानने के लिए यह लेख पढ़ें रुद्र ग्रंथि खुलने पर यही होता है।


वह्नि कुंडलिनी श्री विद्या का वह अनोखा concept जो कहीं नहीं मिलता

यहाँ एक बात है जो मुझे बहुत कम जगह मिली और जो श्री विद्या को सामान्य कुंडलिनी योग से अलग करती है।

विज्ञानभैरव के 67वें श्लोक में दो शब्द आते हैं वह्नि और विष।

वह्नि कुंडलिनी श्री विद्या का वह अनोखा concept जो कहीं नहीं मिलता

वह्नि का अर्थ है अग्नि। यह अधः कुंडलिनी से जुड़ा है यानी मूलाधार की कुंडलिनी। वह्नि वह अवस्था है जब प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करके मूलाधार तक पहुँचता है। इसमें एक संकोच होता है जीव का स्वरूप सिकुड़ता है, एकाग्र होता है। जैसे अग्नि हवन की आहुति को देवताओं तक ले जाती है, वैसे ही वह्नि कुंडलिनी को ऊपर उठाने की तैयारी करती है।

विष यह ऊर्ध्व कुंडलिनी से जुड़ा है सहस्रार की ओर। यह विकास की अवस्था है।

श्री विद्या में यह concept बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कुंडलिनी को force नहीं किया जाता। कोई जबरदस्ती नहीं, कोई हठ नहीं। बल्कि तपोबल साधना की ऊर्जा धीरे-धीरे अधः कुंडलिनी में प्रवेश करती है। यह वह्नि की अवस्था है। और जब देवी की कृपा होती है, तब यही ऊर्जा ऊर्ध्व कुंडलिनी बनकर ऊपर उठती है।

गोरक्षनाथ के अमरौघशासन में भी यही बात कही गई है यह प्रक्रिया क्रमिक है, प्राकृतिक है।

यही श्री विद्या की सबसे बड़ी विशेषता है। यहाँ साधक को "विकसित" किया जाता है दबाया नहीं। देवी की कृपा से जागरण होता है किसी तकनीक की जबरदस्ती से नहीं।


साधना में कुंडलिनी के अनुभव ये क्यों होते हैं?

जो साधक नियमित रूप से पंचदशी मंत्र का जाप करते हैं, वे अक्सर कुछ अनुभव बताते हैं जो उन्हें हैरान करते हैं।

रीढ़ में गर्मी जैसे कोई गर्म धारा नीचे से ऊपर की ओर बह रही हो। यह वह्नि कुंडलिनी का जागरण है। प्राण सुषुम्ना में प्रवेश कर रहा है।

सिर में दबाव या स्पंदन खासकर भ्रूमध्य में या सिर के शीर्ष पर। यह आज्ञा चक्र और सहस्रार की सक्रियता है। रुद्र ग्रंथि खुलने की शुरुआत।

गहरी शांति जो शब्दों में बयान नहीं होती जाप के बाद एक ऐसी चुप्पी जो भीतर से आती है। यह अनाहत चक्र का खुलना है।

कभी-कभी आँखों में आँसू बिना किसी कारण के। यह भावनात्मक शुद्धि है विष्णु ग्रंथि के खुलने की प्रक्रिया।

और कभी-कभी ध्यान में प्रकाश दिखना, या एक अजीब सी उपस्थिति का अनुभव। यह देवी की कृपा का स्पर्श है।

ये सब अनुभव इसलिए होते हैं क्योंकि पंचदशी मंत्र सीधे तीनों ग्रंथियों पर काम करता है। यह कोई imagination नहीं है यह वास्तविक ऊर्जा का प्रवाह है।

हाँ, एक बात ज़रूर कहूँगा अगर ये अनुभव बहुत तीव्र हों, या असहज करें, तो गुरु से ज़रूर बात करें। साधना में मार्गदर्शन हमेशा ज़रूरी है।


श्री विद्या vs सामान्य कुंडलिनी योग असली फर्क क्या है?

यह सवाल बहुत लोग पूछते हैं। और यहाँ मैं honest रहूँगा।

सामान्य कुंडलिनी योग में जैसा आजकल बहुत जगह सिखाया जाता है ऊर्जा को force से ऊपर उठाने की कोशिश होती है। तीव्र प्राणायाम, बंध, मूलबंध, उड्डियान बंध ये सब ऊर्जा को जबरदस्ती ऊपर धकेलते हैं। यह कभी-कभी काम करता है। लेकिन risks भी ज़्यादा हैं। बिना तैयारी के, बिना गुरु के, बिना शुद्धि के यह ऊर्जा संभाली नहीं जाती। मानसिक अस्थिरता, अत्यधिक गर्मी, नींद न आना ये सब हो सकता है।

श्री विद्या में यह नहीं होता। यहाँ देवी की कृपा से क्रमिक जागरण होता है। पंचदशी मंत्र का जाप, नवावरण पूजा, श्री यंत्र का ध्यान ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें कुंडलिनी स्वाभाविक रूप से जागती है। जैसे सूरज की रोशनी में फूल खिलता है जबरदस्ती नहीं।

इसीलिए श्री विद्या को "सुरक्षित मार्ग" कहते हैं। यहाँ साधक को विकसित किया जाता है तोड़ा नहीं जाता।

एक और फर्क सामान्य कुंडलिनी योग में लक्ष्य अक्सर "अनुभव" होता है। श्री विद्या में लक्ष्य है देवी के साथ एकाकार होना भोग और मोक्ष दोनों। यह बहुत बड़ा फर्क है।

श्री विद्या के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें।


गुरु दीक्षा क्यों ज़रूरी है इस संगम में

यह वह हिस्सा है जहाँ मैं सबसे ज़्यादा सावधान रहता हूँ क्योंकि यहाँ सबसे ज़्यादा गलतफहमियाँ हैं।

बहुत लोग YouTube पर पंचदशी मंत्र सुनकर उसे जपने लगते हैं। मैं समझता हूँ जिज्ञासा स्वाभाविक है। लेकिन यह ऐसा है जैसे किसी high voltage electrical system का diagram देखकर उसे बिना training के handle करना। शक्ति तो है लेकिन अगर सही तरीके से channel न हो, तो नुकसान भी हो सकता है।

गुरु दीक्षा में क्या होता है? गुरु सिर्फ मंत्र नहीं देते। वे अपनी साधना की ऊर्जा का एक अंश साधक में transfer करते हैं। इसे शक्तिपात कहते हैं। यह शक्तिपात साधक की कुंडलिनी को safely activate करता है एक ऐसे तरीके से जो उस साधक की क्षमता और तैयारी के अनुसार हो।

शक्तिपात क्या है और यह कैसे काम करता है यह लेख ज़रूर पढ़ें।

और याद करें श्री यंत्र के छठे आवरण (अंतर्दशार) का संबंध आज्ञा चक्र से है, जिसे गुरु-द्वार कहते हैं। यह कोई संयोग नहीं है। श्री विद्या की संरचना में ही गुरु का स्थान encoded है। बिना गुरु के यह द्वार नहीं खुलता और बिना इस द्वार के सातवाँ, आठवाँ और नौवाँ आवरण यानी सहस्रार और उससे आगे नहीं मिलता।

बिना गुरु के कुंडलिनी जागरण के बारे में हमने विस्तार से लिखा है वह भी पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या श्री विद्या साधना से कुंडलिनी जागरण होता है?

हाँ और यही इस पूरे लेख का सार है। श्री विद्या साधना कुंडलिनी जागरण का सबसे व्यवस्थित और सुरक्षित मार्ग है। पंचदशी मंत्र के तीन कूट तीनों ग्रंथियों को क्रमिक रूप से खोलते हैं। नवावरण पूजा कुंडलिनी की मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा को बाहर से साकार करती है। लेकिन यह जागरण force से नहीं होता देवी की कृपा से होता है। इसीलिए यह टिकाऊ है, सुरक्षित है।

पंचदशी मंत्र से कुंडलिनी कितने समय में जागती है?

सच कहूँ तो इसका कोई fixed timeline नहीं है। और जो भी कोई "21 दिन में कुंडलिनी जागरण" जैसी बात कहे, उससे सावधान रहें। यह साधक की पात्रता, पिछले जन्मों के संस्कार, गुरु की कृपा और साधना की नियमितता पर निर्भर करता है। कुछ साधकों को महीनों में अनुभव होते हैं, कुछ को वर्षों लगते हैं। लेकिन नियमित जाप से चक्रों में सक्रियता, रीढ़ में ऊर्जा का प्रवाह और मानसिक शांति ये अनुभव अपेक्षाकृत जल्दी शुरू होते हैं। असली जागरण एक क्रमिक प्रक्रिया है, कोई एक रात की घटना नहीं।

क्या बिना कुंडलिनी जागरण के श्री विद्या साधना पूरी होती है?

यह सवाल थोड़ा उलटा है। दरअसल श्री विद्या साधना का अंतिम लक्ष्य ही कुंडलिनी का सहस्रार में शिव से मिलन है यानी पूर्ण जागरण। तो बिना कुंडलिनी जागरण के साधना "पूरी" नहीं होती, वह चलती रहती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जब तक पूर्ण जागरण न हो, साधना व्यर्थ है। हर स्तर पर हर ग्रंथि के खुलने पर, हर चक्र के जागने पर साधक को गहरे अनुभव और परिवर्तन होते हैं। यात्रा ही मंज़िल है।

श्री विद्या और कुंडलिनी योग में से कौन सा पहले करें?

यह सवाल ही गलत है जैसा मैंने शुरुआत में कहा था। अगर आप श्री विद्या की दीक्षा लेते हैं, तो आप कुंडलिनी जागरण का मार्ग ही चुन रहे हैं। अलग से "कुंडलिनी योग" करने की ज़रूरत नहीं। हाँ, अगर आप अभी दीक्षा के लिए तैयार नहीं हैं, तो ललिता सहस्रनाम का पाठ, सौंदर्यलहरी का पाठ, और सामान्य ध्यान साधना से शुरुआत करें। यह आपको धीरे-धीरे तैयार करेगा।


अंत में एक बात जो मैं हमेशा याद रखता हूँ

कुछ साल पहले एक वरिष्ठ साधक ने मुझसे कहा था "श्री विद्या को समझना चाहते हो? तो पहले यह समझो कि तुम खुद क्या हो।"

उस वक्त मुझे यह बात थोड़ी philosophical लगी। लेकिन जितना इस विद्या को समझा, उतना ही लगा कि वे बिल्कुल सही थे।

श्री यंत्र का वह बिंदु जो केंद्र में है, जो पूरे यंत्र का हृदय है वह कहीं बाहर नहीं है। वह आपके अपने मूलाधार में है। सोई हुई कुंडलिनी के रूप में। और नवावरण की पूरी यात्रा नौ आवरण, नौ चक्र, नौ परतें यह सब उस बिंदु तक पहुँचने का रास्ता है। जो आपके भीतर ही है।

श्री विद्या इसीलिए "विद्या" है क्योंकि यह वह ज्ञान है जो आपको आपसे ही मिलाती है।

और कुंडलिनी जागरण इसीलिए "जागरण" है क्योंकि यह कोई नई चीज़ नहीं जगाता। जो पहले से है, जो हमेशा से था उसे बस याद दिलाता है।

यह यात्रा आसान नहीं है। इसमें समय लगता है, धैर्य लगता है, गुरु की कृपा लगती है। लेकिन जो साधक इस मार्ग पर चलते हैं, वे बताते हैं कि हर कदम पर हर ग्रंथि के खुलने पर, हर चक्र के जागने पर एक ऐसी शांति और पूर्णता का अनुभव होता है जो किसी और चीज़ से नहीं मिलती।

तो अगर आप इस मार्ग पर हैं या इस पर चलने की सोच रहे हैं तो एक काम करें। पहले श्री विद्या को ठीक से समझें। फिर एक सच्चे गुरु की तलाश करें। और फिर धैर्य के साथ, श्रद्धा के साथ चलते रहें।

बिंदु आपका इंतज़ार कर रहा है।


स्रोत और संदर्भ:

  • योगकुंडल्युपनिषद् ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि, रुद्र ग्रंथि पर श्लोक
  • विज्ञानभैरव तंत्र श्लोक 67 (वह्नि और विष की व्याख्या)
  • गोरक्षनाथ कृत अमरौघशासन वह्नि कुंडलिनी की व्याख्या
  • आदि शंकराचार्य कृत सौंदर्यलहरी
  • ललिता सहस्रनाम (ब्रह्मांड पुराण)